रामायण का धोबी

                              हजार वर्ष पर्यंत श्री रामचंद्र जी ने अयोध्या नगरी पर राज किया और सभी प्रजा को संतुष्ट किया ।अंत में जब वह बैकुंठ लोक में जाने लगे सभी देवतागण जो उनके साथ में उनकी मदद के लिए रूप बदलकर आए थे , वे सभी उनके साथ जाने लगे इस कारण से अयोध्या नगरी के वासी भी उनके साथ उनके मोह में उनके साथ वैकुंठ जाने के लिए बोलने लगे तो प्रभु ने जो इच्छुक थे सबको साथ में ले लिया।

                            अंत में एक व्यक्ति कोने में खड़ा होकर भगवान को बड़ी ही दयनीय आंखों से निहार रहा था भगवान ने उसे भी अपना हाथ दिया ।वह व्यक्ति  वही धोबी था , जिसने माता सीता के ऊपर लांछन लगाया था भगवान ने उसे भी अपने साथ लेकर गए। 

                           वैकुंठ के द्वार पर  द्वारपाल ने सबको एक-एक करके अंदर लिया, लेकिन धोबी को मना कर दिया भगवान ने ने कहा कि इसे भी अंदर ले लो लेकिन  द्वारपाल ने कहा नहीं इसने हमारी माता सीता का अपमान किया है और जो मेरे स्वामी का अपमान करेगा मैं उसे अपने घर में नहीं ले सकता हूं यह मेरे स्वामी भक्ति के विरुद्ध है।

                        भगवान  विष्णु धोबी का हाथ पकड़कर कैलाश पर्वत पर ले गए और महादेव को कहा कि आप इस धोबी को अपने कैलाश पर्वत पर आश्रय दे दे ।लेकिन भोले शंकर और माता पार्वती हाथ जोड़कर खड़े हो गए और उन्होंने कहा कि हम दिन -रात आपकी पूजा करते हैं भगवान और जिसने हमारी माता लक्ष्मी का अपमान किया है हम उसे अपने घर में स्थान नहीं दे सकते इसके लिए आप हमें कृपया क्षमा कीजिए।

                       धोबी भगवान की तरफ बहुत ही लज्जित नजरों से देखने लगा भगवान ने उसको धीरे से इशारा किया कि मैं तुम्हें स्थान दिलाता हूं ,और अब वह ब्रह्म लोक में धोबी को लेकर गए ।विष्णु भगवान को ब्रह्मलोक में धोबी के साथ आते हुए देखकर ब्रह्माजी और ब्रह्माणी जी हाथ जोड़कर खड़े हो गए भगवान विष्णु ने कहा कि आप इस धोबी को ब्रह्मलोक में आश्रय दीजिए भगवान ब्रह्मा ने कहा नहीं भगवान यह नहीं हो सकता आप मेरे जन्म दाता है और जो मेरे जन्म दाता का अपमान करेगा उस पर लांछन लगाएगा मैं उसको अपने घर में आश्रय नही दे सकता ।

                          अब अंत में भगवान विष्णु धोबी का हाथ पकड़कर उसे पाताल लोक में ले गए ।जहां पर सभी राक्षस गण दरवाजे पर आकर खड़े हो गए भगवान ने कहा कि  तीनो लोक में धोबी को कोई स्थान नहीं दे रहा है तो कृपया इसे आप लोग अपने राक्षस लोक में स्थान दे दे ।राक्षस गण ने कहा कि ऐसा कदापि नहीं हो सकता जो अपने आराध्य भगवान का जिसका दिया खाते पीते हैं उसके बारे में यह बुरा बोल सकते हैं तो यह हमारे लिए क्या कर सकते हैं जो अपने भगवान की निंदा कर सकता है वह हमारा कभी नहीं हो सकता इसलिए इसे हम अपने राक्षस लोक में नहीं रख सकते।

                             धोबी को अपनी गलती का अहसास हुआ और वह भगवान विष्णु के चरणों में गिरकर अपने आंसुओं से उनके पैर धोने लगा कहा हे भगवान मुझे क्षमा कर दीजिए । मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया है मैंने अपने भगवान अपनी माता का अपमान किया है। इसलिए मुझे तीनो लोक में तो क्या मुझे राक्षस लोक में भी स्थान नहीं मिल रहा है ।भगवान अब मेरा क्या होगा भगवान ने कहा कि जिसका हाथ भगवान विष्णु थामते हैं उसको परेशान होने की जरूरत नहीं है। तुम्हें कोई अपने लोक में नहीं रख रहा है , तो मैं तुम्हारे लिए नए लोक का निर्माण करूॅगा । जिसका नाम रहेगा साकेत और तुम वही रहोगे, लेकिन जो तुमने अपराध किया है इसका फल तो तुम्हें मिलेगा ही साकेत मे  तुम अकेले ही रहोगे ना तुम्हें कोई देख सकता है ना तुम किसी को देख सकते हो ।

                    इस प्रकार धोबी ना घर का रहा ना घाट का रहा इससे यह सीख मिलती है कि हमें अपने आराध्य का अपने भगवान की न निंदा करनी चाहिए न निंदा सुननी चाहिए।

                          ।।राधे राधे।।

Enjoyed this article? Stay informed by joining our newsletter!

Comments

You must be logged in to post a comment.

About Author