मृत्यु का सच

       एक गांव में पंडित दीनानाथ अपनी धर्मपत्नी और तीन संस्कारी पुत्र के साथ हंसी-खुशी जीवन व्यतीत कर रहे थे। बड़े वाले पुत्र की उम्र 18 वर्ष थी दूसरे पुत्र की उम्र 14 वर्ष थी और तीसरे पुत्र की उम्र 7 वर्ष थी ।

      एक दिन गांव में किसी की बारात जा रही थी गांव में सभी को निमंत्रण दिया गया था ।  पंडित दीनानाथ अपने तीनों बेटों के साथ बारात में शामिल हो गए।

         बारात बड़ी ही धूमधाम के साथ दूसरे गांव में गई शादी विवाह संपन्न हुआ और बारात पुनः अपने गांव में वापस आने लगी। कार में पंडित दीनानाथ जो कि उस घराने के पुरोहित थे ,अपने तीनों बेटों के साथ बैठ गए।

         कार जब बीच रास्ते में पहुंची तो सामने से एक ट्रक बड़ी ही तेजी से आ रही थी ड्राइवर का संतुलन बिगड़ जाता है और कार ट्रक से टकरा जाती है।कार बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो जाती है। गांव के आसपास के लोग जमा हो जाते हैं, कार का दरवाजा नहीं खुलता है।

                कार को किसी प्रकार तोड़कर अंदर देखा जाता है अंदर की हालत बहुत ही हृदय विदारक रहती है।  सभी लोग खून से लथपथ थे उसमें से कोई बचा है इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी

              गांव वालों ने फुर्ती के साथ में सभी को कार से बाहर निकालने की जद्दोजहद शुरू कर दी घटनास्थल पर ही तीनों बेटों की मृत्यु हो जाती है पंडित जी और ड्राइवर की सांसे चलती रहती है जैसे तैसे उन्हें हॉस्पिटल पहुंचाया जाता है।   

           कुछ समय बाद पंडित और उनकी धर्मपत्नी बहुत ही उदास होकर अपने गुरु के पास जाते हैं और कहते हैं ,""हे गुरुवर मैंने सारा समय प्रभु ध्यान में लगाया और दोनों समय ही पूजा-पाठ में व्यतीत किया हमने कभी किसी का बुरा नहीं किया तो हमारे साथ में भगवान ने इतना बुरा क्यों किया हम समझ नहीं पा रहे हैं।"" गुरुवर ने कहा होनी को कौन टाल सकता है लेकिन उन्होंने अपनी आंखें बंद की और अंतर्ध्यान वह गए।

          गुरुवर ने कहा पंडित दीनानाथ क्या तुम अपने तीनों पुत्रों को फिर से देखना चाहते हो मिलना चाहते हो पंडित दीनानाथ की आंखें बड़ी हो गई उन्होंने कहा ,""कैसे ? गुरुवर पंडित दीनानाथ के गुरु जी ने कहा ,""तुम अमावस्या के दिन रात के 12:00 बजे मेरी कुटिया में फिर से आना।

              निश्चित समय पर पंडित दीनानाथ अपनी धर्म पत्नी के साथ गुरुवर की कुटिया में पहुंचे।गुरुवर ने दोनों पति-पत्नी को बरगद के पेड़ के नीचे छुपकर बैठने के लिए कहा और कहा अभी तुम्हारे तीनों पुत्र एक-एक करके बाहर आएंगे । सच में तीनों पुत्र एक-एक करके बाहर आए पंडित और उनकी धर्मपत्नी दौड़ कर अपने बच्चों को गले लगाना चाहते थे, लेकिन गुरुवर ने उन्हें रोक दिया और कहा पहले सुनो वह क्या आपस में बातें कर रहे हैं।

        बड़ा पुत्र आता है और दोनों छोटे भाइयों से कहता है कि हमने पंडित - पंडिताइन को बहुत मजा चखाया। देखो दोनों कैसे रो रहे हैं गिडगिडा रहे हैं हमारी मृत्यु का कितना उन्हें शोक हो गया है।

             वह दिन भूल गए जब हम तीनों भाइयों को पिछले जन्म में हमारे पिता के साथ एक मामूली जमीन विवाद में एक ही कमरे में बंद करके आग लगा दी थी और हमारी जान ले ली थी।

           छोटा भाई कहता है ,''सबसे अधिक तो मैंने उन्हें दर्द दिया है ,बड़े प्यार से मुझे स्कूल भेजने की तैयारी कर रहे थे मेरे लिए नए-नए यूनिफार्म और बैग खरीद रहे थे लेकिन मैं उन्हें छोड़कर निकल गया ।

            उसके बाद दूसरा बेटा कहता है, अरे ! तुमने कहाँ उन्हें दर्द दिया दर्द तो मैंने दिया है अब वह मुझे कॉलेज में प्रवेश करवाने वाले थे और अपना बुढ़ापा संवारने की सोच रहे थे कि बेटा बड़ा होकर काम आएगा और मेरे बुढ़ापे की लाठी बनेगा ।

          तब तक सबसे बड़ा भाई आता है वह कहता है तुम दोनों ने उन्हें क्या तकलीफ दी है तकलीफ तो मैंने दी है जवान बेटा जिसकी शादी की तैयारी कर रहे थे सबसे अधिक तो मैंने उन्हें घात दिया है मैंने तो उन दोनों बुड्ढा -बुड्ढी की कमर ही तोड़ दी। और तीनों जोर से ठहाका मार के हंसने लगते हैं।

        पंडित और पंडिताइन यह सब दृश्य देखकर वह एकदम मोह मुक्त हो जाते हैं और धीरे-धीरे अपने गुरुवर का पैर छूकर अपने घर की तरफ चल देते हैं और प्रभु भक्ति में लीन हो जाते हैं।

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