बेटी ही मानव जीवन दाता है

आज भी समाज में एक बेटी के जनम में कोई कांश बदलाव नजर नही आते है । जैसे किसी के यहाँ बेटी पैदा होती है। और कोई कह दे कि "बेटी हुई है " तो उतनी खुशी नही होती है। जितनी खुशी यह सुनने पर होती है कि बेटा हुआ है। ..

ये भेदभाव सदियों से चला आ रहा है। सब कुछ जानते है कि बेटी मानव जीवन और सृष्टि की रचियता है। फिर भी हर कोई यह नही चाहता कि उसके घर बेटी पैदा हो।

इसका एक ही कारण है। कि पुरुष प्रदान देश में स्त्री की स्थिति केवल वंश वृद्धि के लिये वंश को जनम देकर परिवार को आगे बढ़ाना।

स्त्री को भोग विलास का साधन समझने वाले लोग ही बेटियो पर अत्याचार करते है। उनके साथ दुराचार करते है। इसी पीडा को कोई इंसान सह नही पाता । और बेटी को जनम देने से भी डर ने लगता है। अगर आये दिन बेटियों के दुराचार की ख़बरे आना बंद हो जाये। और बेटी को पुरुषों के समान हर अधिकार मिले। तो शायद कोई बेटी को जनम देने से नही डरेगा।

हम कभी नही बदल सकते ' क्योकि किसी एक इंसान के बदलने से देश था ' समाज नही बदलने वाला । आज समाज में बेटियों की संख्या कम हो रही है। और बेटो की संख्या ज्यादा है। इस स्थिती से घबराकर हमने " बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओं आंदोलन चला दिया। " । पर क्या सच में इस किताबी अभियान का कोई असर दिखाई देता है? क्या सच में बेटी सुरक्षित है।? पूछो अपने दिल सें !!! पहले पर्दा प्रथा थी। और आज दहेजप्रथा है " पहले सती प्रथा थी और आज दहेज के लालच में यह प्रथा नजर आती है। पहले अपने पति के साथ चिता में कूदकर जान दे देती थी। और आज पैसों की खातिर अपनी बहु बेटियो को निलाम किया जाता है। इस खौफ के कारण एक प्रथा और बनी बाल विवाह . लोग अपनी छोटी छोटी बेटियो को सुरक्षित रखने के लिये बाल विवाह करने लगे। अगर बेटी दुर्गा शक्ति है। तो हम इस शक्ति की अवतार का आदर करने योग्य नही है। जब जब हमारी कोई बेटी दुराचार का शिकार होती है। तब तब मीडिया नेता सभी राजनीति करके अपने " वोट और नोट " की जुगाड़ में लग जाते है ।जनता के द्वारा जुलूस निकाला जाता है। शांति के लिये पाठ किये जाते है । ॥ सब बकवास है" अगर सच में हम इतने ही बडे दया शील है । तो अपराध को बढावा देने मौका क्यो देते है? क्यो अपराधी को सजा नही होती? क्यों हर अपराधी रिया कर दिया जाता है।? ना कोई बदलाव आया है। और ना कोई बदलाव आयेगा। बेटी और बेटे का भेदभाव अगर खत्म करना हो तो तन मन से करो। वरना " "" बेटी बचाओ बेटी बचाओ कहने से बेटियां नही बचने वाली""""

बेटी ही मानव को नौ महिने अपनी कोख में रखकर जालती है । बेटी मां बहिन बनकर पुरुष के हर कार्य में कंधा से कंधा मिलाका चलती है। फिर बेटियों को जिन्दा रखने के लिये अभियान क्यो चलाना पड़ता है? क्यों आखिर हम खुद को समझा रहे है।? सृष्टि की रचना बिना स्त्री के नही हो सकती है।

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