प्रवृति

                            एक समय की बात है ,एक साधु महात्मा  गंगा तट पर स्नान करने जाते थे । स्नान करके अपने आश्रम में पूजा - पाठ करके भगवान में अपना ध्यान लगाते थे ।

 

                         एक बार  जब महात्मा जी गंगा जी में स्नान कर रहे थे , तभी उनके हाथों में कुछ आया जिससे उन्हें दर्द हुआ उन्होंने पानी से भरा हुआ हाथ ऊपर उठाया तो उसमें बिच्छू था । बिच्छू  ने उनको डंक मार दिया था, महात्मा ने पानी के साथ ही बिच्छू को बाहर गंगा तट पर फेंक दिया  और स्नान करने लगे ।

 

                       कुछ समय बाद बिच्छू फिर से पानी में आ गया साधु ने देखा और उसकी प्राण रक्षा हेतु उसे पानी से बाहर निकालकर गंगा तट पर फेंक दिया लेकिन बिच्छू भी जिद्दी था जितनी बार महात्मा उसे जल से बाहर निकालते वह वह अंदर आ जाता और महात्मा जैसे उसे बाहर निकालते वह उनके हाथों में डंक मार देता था ।

 

                       ऐसा कई बार हुआ महात्मा ने सोचा यह बिच्छू है इसकी प्रवृत्ति डंक मारना है ।  मैं तो साधु महात्मा हूं मेरा कार्य लोगों की जीव जंतुओं की रक्षा करना है ।जब बिच्छू अपनी प्रवॄति नहीं बदल रहा है डंक मारने की तो मैं साधु महात्मा होकर अपनी प्रवृत्ति क्यों बदलूं ।

 

                   ऐसा सोचकर बिच्छू जितनी बार  पानी में आता उतनी बार महात्मा उसे और तेजी से दूर फेंक देते । बार-बार ऐसा होने से बिच्छू थक गया  और उसने अपनी राह बदल ली और साधु जी भी स्नान करके अपने आश्रम की तरफ बढ़ गए ।

           इस प्रकार हमने देखा अंततः बुराई पर अच्छाई की जीत हो गई ।

 

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