कलयुग का आगमन

              राजा जन्मेजय महाराज परीक्षित और रानी इंद्रावती के पुत्र थे। राजा परीक्षित उत्तर के गर्भ में पलने वाले वो भूण थे,  जिनकी हत्या अश्वत्थामा ने गर्भ में ही कर दिया था परंतु कृष्ण भगवान ने उन्हें नया जीवनदान दिया था और राजा परीक्षित के समय से ही कलयुग का प्रारंभ हुआ था ।

           एक समय की बात है राजा परीक्षित शिकार करने गए थे। वे रास्ता भटक गए और भूख - प्यास से वह जलाशय  ढूढने लगे  तभी उन्हे श्रृंगी नामक ऋषि का आश्रम दिखा । वहाँ पर शमिक ऋषि बह्म ध्यान  में लीन थे । राजा ने उनसे पानी और कुछ भोजन के लिए पूछा लेकिन ब्रह्म ध्यान में लीन होने के कारण ऋषि ने कोई जवाब नहीं दिया परीक्षित के सिर पर सोने का मुकुट था सोने में कलयुग विराजमान था जिसके कारण राजा ने अभिमान के वश में होते हुए पास में ही पड़ा एक मृत सांप ऋषि के गले में लपेट दिया । राजा को लगा ऋषि उनका अपमान  कर रहे है।

              जब शमीक के पुत्र ऋषि श्रृंगी को इस बात का पता चला तो उन्हें लगा कि यह राजा बड़ा ही अभिमानी है अगर यह जीवित रह गया तो यह ऋषियों का अपमान करेगा और प्रजा को सुखी नहीं रखेगा उनके पिता का घोर अपमान राजा ने किया है इसलिए उन्होंने ब्रह्म कमंडल उठाया और मंत्र उच्चारण करके राजा को शाप दे दिया कि 7 दिनों के अंदर सर्पदंश के कारण राजा की मृत्यु हो जाएगी

                   ब्रह्मा ध्यान से उठने के बाद जब ऋषि को अपने पुत्र श्रृंगी का क्रोध और शाप के बारे में पता चला तो उन्होंने बहुत क्रोध आया ।उन्होंने अपने बेटे से कहा,'अरे !मूर्ख तुझे ज्ञान देना ही नहीं चाहिए था तुझे नहीं मालूम तूने कितना बड़ा पाप कर दिया है वह राजा अपने  सिर पर सोने के मुकुट के प्रभाव में आने के कारण  मेरे गले में सर्प डाला था ।वो राजा बहुत ही न्याय प्रिय और भगवान की भक्ति में लीन रहने वाले हैं ।उनके राज्य में हम सब ऋषि लोग निर्भीकता पूर्वक जब तक ध्यान कर पा रहे हैं  उनकी मृत्यु हो जाने से कलयुग का आगमन हो जाएगा और सब जगह त्राहि-त्राहि मच जाएगी भाई भाई का दुश्मन हो जाएगा पैसा ही सब कुछ रहेगा धर्म , ज्ञान का धीरे-धीरे लोप हो जाएगा ।

                 इधर सोने का मुकुट उतारने के बाद राजा परीक्षित को ज्ञान होता है कि उन्होंने ऋषि का अपमान किया है जिसका उन्हें बहुत पश्चाताप होता है ।तब तक ऋषि ने अपने शिष्य को भेजकर राजा को आगाह कर दिया कि आपका सात दिन के बाद सर्पदंश के कारण मृत्यु हो जाएगी। राजा ने कहा ठीक है मुझे मेरे पाप का दंड मिल गया मैं बहुत खुश हूं । राजा परीक्षित ने शिष्य को उचित सम्मान और उपहार देकर उन्की विदाई की और अपने पुत्र राजा जन्मेजय का राजतिलक किया और स्वयं सन्यास धारण करके भगवान की भगवत भक्ति में लीन हो गए ।       

           राजा जन्मेजय को ऋषि के पुत्र श्रृंगी द्वारा किया गया कृत्य से बहुत दुख होता है और अत्यंत क्रोध में आ जाते हैं ।  मैं दुनिया में एक भी सर्प जीवित नहीं रहने दूंगा जो कि मेरे पिता को काटे और उनकी मृत्यु हो।  विशाल यज्ञ का आयोजन हुआ जिसमें सभी सर्प दूर-दूर से आकर स्वयं आहुति में जलने लगते हैं  । नाग लोक में सभी भयभीत हो जाते हैं।  जन्मेजय राजा के सामने आकर हाथ जोड़कर अपने वंश को बचाए रखने की याचना करते हैं।

                     नाग - नागिन नें कहा नियति नें राजा परीक्षित की मृत्यु इस प्रकार लिखी है हमारा कोई दोष नहीं । सभी देवता गण और ऋषि मुनि राजा जन्मेजय को समझाने लगे कि जब तक राजा परीक्षित की मृत्यु नहीं होगी कलयुग का आगमन नहीं हो सकता इसलिए इसे होने दीजिए ।नाग नागिन ने आशीर्वाद दिया कि जो भी राजा जन्मेजय का नाम लेगा हमारी वंशावली के लोग उनके आसपास नहीं दिखाई देंगे। आज भी ऐसी मान्यता है कि जब भी हम कहते हैं दोहाई राजा जनमेजय की तो हमारे आसपास में सर्प काफी दूर हो जाते हैं। 

          ।।दोहाई राजा जन्मेजय की।।

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